प्रिय जय , एडिटिंग से मेरा मतलब ये कि , काश पुराने दिनों में से कुछ काट छाँट सम्भव होती ! उनमे कुछ नया जोड़ते ! कुछ पुराना छोड़ते वगैरह वगैरह ! मैं तो शायद कम उम्र में ओढी गई बुज़ुर्गीयत सबसे पहले छोड़ता ! उसके बाद बिना शादी के गुज़रे हुए दिनों की गिनती कम कर देता ! आखिर मैंने उसी लड़की से शादी की है जिससे मैं तकरीबन नौ साल पहले शादी कर सकता था !
ऐसे ढ़ेर सारे लोग /लम्हे हैं जिन्हें मैं डिलीट करना पसंद करता ! लेकिन कुछ लोग /लम्हे ऐसे भी हैं जिन्हें मैं अपनी जिन्दगी में शामिल ज़रूर करता !और अगर कैरियर के हिसाब से सोचूं तो सागर छोड़ना मेरी भूल थी , जिसे मैं ज़रूर सुधारता , वहां मुझसे जूनियर लोगों की दसों अंगुलियाँ घी और सर कढाई में जो है !
मगर जय ,ये जो जीवन है , अब इसमे कोई एडिटिंग मुमकिन नहीं ! उस समय जो सही लगा उसके साथ जिया ! अभी जो सही लग रहा है उसके साथ जीना है ! हो सकता है कल को इसमें भी कोई कमी दिखाई दे !
सत्य ये है कि , जीवन में 'वर्तमान' से ज्यादा निर्णायक कुछ भी नहीं होता ! भूतकाल और भविष्य , महज़ हमारे चिंतन का हिस्सा हो सकते हैं , लेकिन निर्णायक तो कतई भी नहीं !
जीवन , मरण के चक्र में इंसान की मन मर्जी नही चलती ,जो भी एडिटिंग करना है वह नियति करती है ! आपकी भावनाओं से मैं सहमत हूँ किंतु सृष्टि और जीवन की बागडोर पराशक्तियों के हाथ होती है और सब कुछ निर्धारण उनका काम है , परिणाम चाहे अच्छा या बुरा जो भी हो !
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