मंगलवार, 6 जनवरी 2009

पलकों की छतरी मैं ऑंखें दो जोड़ी

हवा हर बार चलती ,ले चलने के लिए, बहकती हुई-------- हम हैं -------के अड़े हुए-------- होश पर------- ठिकाने पे अटके हुए------- न सोच ----न कोई विचार-------- कोई बेचैनी -------न कोई सामना ------। कुन्दगालिब ---------। चमड़े -सी चमड़ी के बोझ तले धड़कन सूखे पापड़ सी फद्फदाती ----------। हटो चलो ----------और किसी ठीये पर टिकें------- या पड़े रहें -------गुनगुनातेहुये मछुआरों का गीत --------- ----जो आता हुआ -------आसमान को चूम कर ।

1 टिप्पणी:

aap svasth rahen.

मेरे बारे में

उज्जैन, मध्यप्रदेश, India
कुछ खास नहीं !