शुक्रवार, 16 जनवरी 2009

तमाशा हो के रहे हम तमाशा करने वाले

रस्सी पर शब्द चल रहे थे। हिला रहा था रस्सी को मैं । । गिर पड़ते थे, कोई -कोई शब्द। फिर चढा देता था उन्हें। उस छोर तक पहुँच के भी ,ठीक पहले गिर पड़ते थे। हाथ मैं कलम थी--संतुलन के लिए। हिलती रस्सी पर फिर मैं भी चढा। गिरा, चढा। गिरा--- शब्द हिला रहे थे अब रस्सी।

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aap svasth rahen.

मेरे बारे में

उज्जैन, मध्यप्रदेश, India
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