शनिवार, 31 जनवरी 2009

बसंत था कि तुम ,मुझ में उतर चुके

इस करवट से दीखता है वो लहलहाता हुआ पेड़, खिड़की से भीतर आता हुआ। बसंत पंचमी पर दावत देने। झरते पत्तों के निमंत्रण पत्र । डाकिया हवा। पीले फूलों से सुगन्धित हवा। अलगनी पर भी सूखते पीले वस्त्र। लहराते दुपट्टे। हलके पीले ,गहरे पीले। पीले-हरे । शाल एक तरफ़ कर दौड़ते हुए तुम चली गई होगी मुझे बीमार मान कर कमरे से बाहर । मैं पीला चेहरा लिए, बसंत मनाता करवट बदलता हूँ । वो खिड़की और वो पेड़ इस तरफ़ भी मेरे सामने आ गए। मेरे पत्ते झरने लगे।

2 टिप्‍पणियां:

  1. जय जी आपकी रचना बहुत अच्छी है !

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  2. रंग, बसंत और समय , ख्याल बहुत अच्छा है !
    पीला रंग मुझे बेहद पसंद है ! जो उत्सव भी है और पतझड़ भी !

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aap svasth rahen.

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