Jay ki baten :::: जय की बातें
शुक्रवार, 9 जनवरी 2009
सिमट कर बैठा इतना कि नुक्ता हो गया
सो जाती हो तुम सो जाती है कायनात । मैं पूरी रात निहारता रहा तुम्हें , कि तुम जब भी उठोगी ,इंतजार करता पाओगी मुझे । ऐसा हुआ भी पर वैसा हुआ नहीं । वैसा हुआ नहीं । अज तलक दुखती हैं ऑंखें और, और ये दिल जैसा कुछ ।
1 टिप्पणी:
उम्मतें
शनिवार, 10 जनवरी 2009 को 8:41:00 pm GMT-8 बजे
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