रविवार, 8 फ़रवरी 2009

मेरे स्याह-आसमानी आज

शरीर और नाम कितने एक हो जाते हैं.याद करते समय चेहरा इन दोनों की जगह ले लेता है. चेहरा,शरीर और
नाम ----इन तीनो के बीच,मेरे दिल,निगाह और एहसास,अपने काम करते रहते हैं;तुम एक रौशनी की लकीर में होती हुई मेरे भीतर उतर गई हो.मेरा स्याह-आसमानी 'आज' —थोड़ा उजला हो जाता है.मेरे दोनों कल मुझे इतना लपेट लेते हैं,कि सारे आज बहुत-से अबों में बिखर गए हैं.---तुम्हारा नाम मेरी बहुत मदद करता है.गुन लेता हूँ.मेरी बातें तुम्हारे सिवा सबको कुछ ज्यादा बेगानी लगती हैं.बल्कि अबूझी .
तुम बहाव के खिलाफ मेरी और आती हो.तुम्हारे उड़ते बालों में-से एक बाल, सारी कायनात को नाप रहा है.इक गंध बन गई है तुम्हारी छोडी सांसे.लाल मिटटी वाले कच्चे फुटपाथ से तुम्हारे घर की तरफ़ निकल पड़ा हूँ.

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aap svasth rahen.

मेरे बारे में

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