अचानक कुछ नहीं होता। हमें ऐसा लगता है । ये हमारी विकास-प्रक्रिया से बनी सोच से पैदा निष्कर्ष है। हम काम के बजाय अचानक कहीं से कुछ हो जाने की उम्मीद पर टिके -२ अनुभवी दिखने लगते हैं। संसार से भागा आदमी गेरुआ बाना धारण कर ले तो ये अनुभवी ढंग ,दिखने का ,उसे पुजवा देता है। ठंडी आग् का दरिया पार किया तो क्या किया। आओ , ख़ुद से अजनबी बन के जियें ।
सुगढ़ आलेख ! सुगढ़ विचार !
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