अपनी आँखों से कब तक देखूं। कब तक नापूं ये दूरी । दो -चार बार की बात नहीं। कब से बना रखा है ,इतनी दूर तुमने ताजमहल । रोज जाता हूँ उस तक। लौट आता हूँ उसे बिना छुए। तुम कहीं जाग न जाओ । जब कि चाहता हूँ जगाना। देख लो कि करता हूँ कितनी मुहब्बत,फ़साने इतने ,युगों तक सुनने-सुनाने के भी बाद।
कमाल का विचार है ! अद्भुत !
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