गुरुवार, 16 जुलाई 2009
दो कहाँ दीवार इक कोने के लिए
संतोष है। अपने किए और अपने न किए पर। न कर सकने पर ज्यादा। करते ,तो करने का घमंड होता। करने से श्रेष्ठ हालां कि कुछ नहीं । अपनी बातों में बातें ही तो हैं केवल । उनके लिए यहाँ कुछ भी नहीं जो अपेक्षा करते हैं। एक निशान हैं जो चिन्हित करता है अगली बारी का। समुद्र के किनारे लगी बेंच पर टिके या बैठे हम। एक इस झूटे एहसास कि कोई आ रखेगा कंधे पर हाथ, की उम्मीद पर। नाउम्मीदी की पूरी उम्मीद हालां कि है।
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मेरे बारे में
- जय श्रीवास्तव
- उज्जैन, मध्यप्रदेश, India
- कुछ खास नहीं !
'नाउम्मीदी की पूरी उम्मीद हालांकि है'
जवाब देंहटाएंसच कहूं तो तुम्हारे शब्दों की ड्रेस मटेरियल, मेरे लिये , नंगे /अधनंगे अहसासात को शीलवान / कुलीन बहू में बदल डालते हैं !