बुधवार, 29 जुलाई 2009

नदी पहाड़ जाने उसने क्या लिया

साहित्य में आलोचना का प्रमुख स्थान है। कई बार स्थापित आलोचक की स्थापनाएं रचनाकार तक को दिशा देती प्रतीत होती हैं। यहीं से कुछ कहने की गुंजाईश बनती है। रचना स्वयं कहती है। उसे कोई विश्लेषित करे ,आपत्ति नहीं । उसका मंतव्य निर्धारित नहीं करे। उसकी दिशा, दशा और औचित्य पर लिखे,बेमानी है । ये ठीक है कि विमर्श होना चाहिए। विचारों का संवहन होना चाहिए। पर इसका रास्ता अपनी या किसी जमीं पर हो। किसी के कंधे पर नहीं। 'बात बोलेगी हम नहीं , भेद खोलेगी बात ही '--शमशेर ।

2 टिप्‍पणियां:

aap svasth rahen.

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कुछ खास नहीं !