शुक्रवार, 5 मार्च 2010
बित्ता भर कद का इत्ता बड़ा असर
हमने अपने को बस अपने लिए ढाल लिया है। अतीत में जाते हैं खुद को साथ रखते हैं । कभी गानों में.मीटिंगों में ---सुंदर चेहरों में,पैसों में,---अपने से जुडी घटनाओं में अपने को ऐसे संग रखते हैं जैसे पर्स को । अपने दोस्त , परिवार,हमें कैसे लेते हैं ,कैसे सहते हैं ये समझना भी जरुरी है। तर्कों में लपेट कर हम भारी महसूसते हैं खुद को। छोटे-छोटे नरक बना दिए हैं हमने अपनों के लिए । उनके बरस कई , हमने मनोरोग अस्पताल जैसे घरो में उलझा दिए हैं। हम कब मेच्योर होंगे। और बने कब तक रहेंगे मेच्योर। बास मारने लगे हैं पोथे, कपडे , हमारे चश्मे, कंगे , हमारे नाम ,हमारा चेहरा,कुर्सी, गाड़ी--------हमारे मोजों से भी ज्यादा। हमारे पांव के अंगूठों ने किसी ठूंठ का आकार ले लिया और जूतों ने उसका । हमने मकां,गली, शहर,प्रदेश,देश और दुनिया तक के जूतों को अपना आकार दे दिया है। हम कब मेच्योर होंगे।
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मेरे बारे में
- जय श्रीवास्तव
- उज्जैन, मध्यप्रदेश, India
- कुछ खास नहीं !
Wah! expression and style is superb
जवाब देंहटाएंशायद कभी भी नहीं ! ये मानवीय स्वभाव है , अनंतकालिक प्रक्रिया है चलती रहेगी !
जवाब देंहटाएंमच्योर और हम ! क्यों हों ??
जवाब देंहटाएंblog is bloched technically.so i am silent.
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