एक बार फिर मूड के हाथों में हूँ। इससे बाहर होने की दहलीज पर हूँ। अपने भीतर गिरा हूँ। बूँद भर। सतह पर ही फ़ैल गयी है। अक्सर तो इससे ज्यादा गिरता हूँ। पर बाहर। एक जोड़ी निगाह के साथ। एक खुशबु भरी परछाई के साये में। समय रहित समय में। गहरी साँस से भरा बर्तन उठाए हुए खड़ा मैं। ----सदी थी मुझ से टिकी हुई ----मेरे सीने से लगी हुई---मेरे हाथ थे --दोनों--स्वाभाविक दिशायों में फैले हुए। -------.
इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.
जवाब देंहटाएंइस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.
जवाब देंहटाएंabove both posts were by me for testing of .
जवाब देंहटाएं