मंगलवार, 16 दिसंबर 2008

अनवर ....

मुझे लगता है कि अनूप को लेकर तुम काफी नर्म दिली अख्तियार कर रहे हो वरना मेरा तो मानना है कि उसकी मूंछों पर अंगुली और लुंगी पर हाथ की थिरकन की वज़ह , तुमसे कोई अदृश्य भय था ! पता नहीं सच क्या है ? खैर !

उन दिनों अपना 'बाबू' यानि कि अनवर बहुत शिद्दत से शादी के लायक हो चुकी कन्याओं के घरों के चक्कर लगाने में व्यस्त रहा करता था और उनमे से शायद ही कोई ऐसा घर होगा जिसमें उसने भोजन की व्यवस्था न कर ली हो !
एक वोही था कि जिसने मेरे और तुम्हारे प्रिंसिपल को अपने बापू से चिट्ठी लिखवा कर अपना गार्जियन बना डाला था !
जो भी कहो अनूप के धनिये से गुना की गल्ला मंडी और अनवर के शादियोत्सुक व्यवहार से छतरपुर की खुशबु आती थी ! जो कि आज भी उतनी ही ताज़ा है !

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aap svasth rahen.

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