दरवाजों पर कुण्डी खटखटा रहे हैं हमारे , कब से लोग । हम हैं कि घुस गए हैं रजाइयों में । हमारी हवा सिर्फ़ हमारी है अब । हमारा कब्जा है दूसरों के सपनों पर । हम एक एहसान हैं , जिसे गरीब अपने सर पर उठाने को मजबूर है । हमारी इज्जत में दूसरों की बेइज्जती टंकी हुई है।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
aap svasth rahen.