रविवार, 4 जनवरी 2009

कभी कुछ ..

कभी कुछ ऐसा भी हो , कि हम शहर के बीचो बीच , भरी पूरी गलियों और बाज़ारों , शोर-ओ-गुल भरे मोहल्लों , किलकारियां मारते हुए बच्चों , कुलांचे भरते हुए किशोरों , बेहद खूबसूरत लड़कियों , चिल्ला चोट करती हुई औरतों , पसीना पोंछकर नोट गिनते हुए मर्दों , गाव तकिये पर अलसाये पड़े सेठों , वगैरह वगैरह के क़रीब , बेहद क़रीब , होकर गुजरें कि हवा भी हमारी आवाज़ सुनने को तरस जाए !

1 टिप्पणी:

  1. " कि हवा भी हमारी आवाज़ सुनने को तरस जाए !" अद्भुत ,शानदार , बेहतरीन , आफरीन !

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aap svasth rahen.

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कुछ खास नहीं !