मंगलवार, 13 जनवरी 2009

काला ठंडा पहाड़ और उम्मीद की गर्मी

तम्बू से बाहर ,रात निकला; ठंडा अँधेरा था। अमावस वाला अँधेरा। और ठंडा, अपनी हड्डियों -सा। आँखों का कोई काम ,सिवा मसलने के ,कुछ न था। ऐसे मैं उम्मीद की गर्मी थी, कि तुम भी आओगी ,अपने तम्बू से बाहर और ,और सिलग उठ्ठेंगी दो सूखी लकडियाँ। --------सिलग उठने के सिवा अब हमारे पास कोई काम न था।

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aap svasth rahen.

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