मैंने खो दिया है बक्सा।
तसल्ली के कुछ पल, स्टीम कोक के धुएँ में
आंसू- भरा माँ का चेहरा, खेल-साथी ,झांकी
स्कूल की ,बरु के हरूप ,गुरूजी की स्केल , गनी और विशुद्धानंद के किस्से
, धूप की घड़ी और पास होने पर मिठाई ,सब बंद हैं उसमें।
मैं यादों के भंवर में से बचपन को निकाल कर
टांग देना चाहता हूँ
उस स्कूल के बचे टूटे हुए
कंगूरे पर जो गोद
लिए जाने से बचा हुआ है।
खूबसूरत ख्याल ,खूबसूरत अहसास , इन्हे यादों में जीना और भी खूबसूरत !
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