बुधवार, 18 फ़रवरी 2009

ओ हवा सुखा दो बच्चों की पट्टी

मैंने खो दिया है बक्सा।

तसल्ली के कुछ पल, स्टीम कोक के धुएँ में

आंसू- भरा माँ का चेहरा, खेल-साथी ,झांकी

स्कूल की ,बरु के हरूप ,गुरूजी की स्केल , गनी और विशुद्धानंद के किस्से

, धूप की घड़ी और पास होने पर मिठाई ,सब बंद हैं उसमें।

मैं यादों के भंवर में से बचपन को निकाल कर

टांग देना चाहता हूँ

उस स्कूल के बचे टूटे हुए

कंगूरे पर जो गोद

लिए जाने से बचा हुआ है

1 टिप्पणी:

aap svasth rahen.

मेरे बारे में

उज्जैन, मध्यप्रदेश, India
कुछ खास नहीं !