गुरुवार, 5 मार्च 2009
तारे बिस्तर पर
अपने से कह लेता हूँ। सोचने की प्रक्रिया से अन्दर –बाहर होता हुआ.-----घिस गए हैं शब्द---और उनके अर्थ.बिना विचारों के वहां बने शब्द, कारण हैंइनके .---खैर .जाती ठण्ड,बल्कि आती गर्मी हमें तारों से बात करने का मौका देती है. घर की छत पर लेटे हैं .तारे उतर आते हैं.बैठ जाते हैं बिस्तर पर,पास-पास.सांसों से छूते हैं परस्पर.कोई राग- विराग नहीं.समय बैठा है साथ ही.बड़े गुलाम अली साहब तैरने लगे.’जोगन बन गए---.’
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मेरे बारे में
- जय श्रीवास्तव
- उज्जैन, मध्यप्रदेश, India
- कुछ खास नहीं !
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