बुधवार, 20 मई 2009
हम अपनी जगह तुम अपनी जगह
हम सोच के स्तर पर स्वतंत्र नही हैं । जिम्मेदारी का प्रश्न नहीं है। हम हमेशा अपने किसी न किसी काम के बारे में सोचने और करने में कम या ज्यादा परेशान होते रहते हैं। समाज को लेकर भी इसी हाल में रहते हैं । हिंसा -अहिंसा ,सच-झूठ ,नैतिकता-अनैतिकता आदि दो ध्रुवों के बरक्स देखा,सोचा और कहा जाता है। विश्लेषण के इस तरह के आधारोंपर समूचा दर्शन और धर्म टिके हैं। मनुष्य से हमेशा सच्चे, अहिंसक और नैतिक रहने की अपेक्षा है। थोड़ा इधर-उधर हुआ तो वह कुंठित हो जाता है। यहाँ तक कि जीवन में कभी एक बार भी वह ऐसा हुआ तो वह जीवन भर मलिन रहता है। इस सामाजिक व्यव्हार में व्यक्ति सहज नहीं रह पाता । व्यक्ति को सदा सहज,सरल और बंधनमुक्त महसूस करना और रहना चाहिए। समाज किसी को यूँ भी बख्शता नहीं है। उसके मूल्यांकन पर कोई खरा नही उतरता। फिर कहता हूँ हमारी प्रसन्नता स्वयं के बादशाह स्वयं रहने में ही है। इस हैसियत के बाद व्यक्ति पहले से बेहतर और अधिक सामाजिक होता है।
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मेरे बारे में
- जय श्रीवास्तव
- उज्जैन, मध्यप्रदेश, India
- कुछ खास नहीं !
समाज में बंधन है... व्यक्तिगतता के साथ सामाजिकता का द्वंद भी है और एकता भी..
जवाब देंहटाएंआप भी यही कह रहे हैं..
स्वयं के बादशाह बनने के बाद...वह अधिक सामाजिक हो जाता है...अच्छा अंतर्विरोध..
प्रिय जय आज कोई टिप्पणी नहीं !
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