सोमवार, 1 जून 2009

राजनैतिक प्रदूषण ---स्केल पर 9

लोग बस इतना चाहते हैं कि उन्हें घर चलाने भर पैसे मिल जायें। कुछ लोग इतना और ,कि सोच-समझ और व्यक्त होने की स्वतंत्रता भी चाहते हों। इतने भर के लिए उन्हें झूट,लफ्फाजी, आश्वासन और विज्ञापन के वातावरण को झेलना पड़ता है। राजनैतिक प्रदूषण,हाँ, यही नाम दूंगा ,इस स्पष्ट दुराचार को,हमारी जान ,तम्बाकू -शराब से ज्यादा सलीके से ले रहा है। तुर्रा ये कि सब लोग वोट डालने नहीं जाते। आज न बेताल हैं न चाचा चौधरी, बीरबल हैं न हकीम लुकमान। इस बार तो गजब ही हुआ। एक दूसरे को नीचा दिखा रहे थे चुनाव प्रचार में , बाद में गले मिल रहे थे और बिना शर्त समर्थन दे रहे थे । सत्ता के लिए ये नाटक क्यों। इस नाटक के लिए वोट देने की अनिवार्यता ? इस तंत्र से मुक्ति के लिए क्या फिर हमें किसी गाँधी की जरुरत होगी?

2 टिप्‍पणियां:

  1. मुझे नहीं लगता इस बार गाँधी जी ये रिस्क लेंगे !

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  2. जरूरत होने से मिल ही जाएँगे क्या?
    घुघूती बासूती
    pl, pl remove the word verification pl. i detest it. it makes life so difficult,leaves such a bad after taste.
    thanks. gb

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aap svasth rahen.

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