मंगलवार, 6 अक्टूबर 2009

लिखना जानता था मैं और पढ़ना भी

चल देना ,कहा था आग ने ,चल दिए थे। भूख की आग इतना ही तो करती है। चेहरे और बदन को आकार देती मंजिलें , रंग के बिना होली का माहौल बनाती है। धुआं -२ शाम.रोटियां बनती हुई ,शराब देशी,बीडी, बच्चे बनते मकान के बालू के ढेर के खेल के हवाले--हाँ तो मैं आग की बस बात कर रहा था। टीवी देखता हुआ।

1 टिप्पणी:

  1. बच्चे बनते मकान के बालू के ढेर के खेल के हवाले--हाँ तो मैं आग की बस बात कर रहा था। टीवी देखता हुआ।


    बढ़िया !

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aap svasth rahen.

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