प्रिय जय ,तकरीबन २७ साल पहले हम लोग प्रमोद वर्मा की कृपा से मिले थे और तुम्हे स्मरण होगा कि दशहरे और दीपावली की छुट्टियाँ मिलने में कुछ वक़्त बाक़ी था और हम लोगों नें ज्वाइनिंग के बाद न्यूज़ पेपर्स का ओढ़ना बिछावना बना कर वक़्त गुज़ारा था !
अनूप जग्गी के घी और धागे की गांठों पर तुम्हारी मेहनत का लुत्फ़ भी तुम्हे याद होगा और जब हम बमुश्किल बस में खड़े होकर छुट्टियों के लिए घर वापस हो रहे थे तो बघेल की लव मैरिज के नाम पर बगल की कोतवाली में जाना भी तुम्हे स्मरण होगा अनवर गौरी और कल्याणी वर्मा के साथ नौकरी की याद भी तुम्हारे जेहन में जस की तस होगी !
इसके बाद लगभग १७/ १८ साल का अन्तराल हम लोगों नें 'लगातार ' मौन रहकर , अपनी अपनी सीपियों में बंद होकर गुजारा है !
मुझे पूरी उम्मीद है कि अब तुम भी मेरी तरह अपने जिस्म के जुगराफ़िया से बेपरवाह और शायद मोटे ? या शायद थुलथुले हो गए होगे !
और जिस्मानी तौर पर उतने चुस्त और दुरुस्त भी नही रह गए होगे पर एक बात तो पक्की है कि तुम आज भी "उन दिनों" को अपने दिल में संजोये बैठे होगे !
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aap svasth rahen.