शनिवार, 13 दिसंबर 2008

अनूप ....

प्रिय जय , तुम्हे ख्याल होगा ?
उन दिनों तुम्हारा विभागाध्यक्ष अनूप ,कमसिन था और रोमांटिक किस्म की बातों/हरकतों में मुलव्विस हुआ करता था ,उसे किसी बंगला भाषी लड़की से मुहब्बत हो गई थी और वो शाम के वक़्त पुरानी टाकीज के पास के 'पान डिब्बे' पर यूँ खड़ा हुआ करता था जैसे उसके खड़े होने के अहसास मात्र से लड़की अपने मकान छत पर सितारों की तरह टंग जायेगी !
मुझे पता नहीं कि वो कभी उसे अपनी किताब में दबाया हुआ मुहब्बतनामा ? दे भी पाया था कि नहीं ?
वैसे मुझे तो ये भी पता नहीं है कि तुमने उसपर कौन से गियर लगाये हुए थे कि उसकी बोलती तुम्हारे सामने हमेशा ही बंद रहा करती थी !

1 टिप्पणी:

  1. डियर अली , अनूप की ही थोडी महानता रही होगी ---और शायद वो मेरी उम्र और डाक्टर
    होने का लिहाज करता हो . तुम्हें लेकिन वो द्रश्य ध्यान होना चाहिए ,जब एक बार कालोनी वाला इंग्लिश में देर तक बात कर रहा था और अनूप मूंछ पर अंगुली रखे रखे लुंगी पहने सुनता जा रहा था --.बहुत सा इस प्रकार का जीवन का खेल ही अपनी पूंजी है --आमीन !

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aap svasth rahen.

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