प्रिय जय , कई बार ऐसा होता है , कि हम बेवकूफों की तरह सोचते हैं,कि पुराने दिन वापस आ जाते ?तो हम ये .....कर लेते , हम वो ......कर लेते !उस वक़्त की अधूरी ख्वाहिशात हमें 'तर्क' से दूर ले जाती हैं ! ...........जो मुमकिन नहीं हैं वहां ..........तक ! काश खुदा हमारी जिन्दगी में भी एडिटिंग की सुविधा देता ?
एडिटिंग की सुविधा तो दी है ,वरना हम चुने हुए लोगों से ही संपर्क नहीं कर पाते .हम करते इससे होता उससे .अच्छा----बेवकूफों की तरह सोचने से ज्यादा सुख और क्या है .
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