रविवार, 25 जनवरी 2009

बूंदें थी कि तुम -तबाह थे हम तो

उड़ रही थी चील । अपनी ऊंचाई पर। वो उतरी इस पोस्ट पर । लेके कुछ, फ़िर वहीं पे थी। मैं यहीं पे था। ----हो रही थी भोर । किरणें उतरीं इस -----पर। ले के कुछ, फ़िर वहीं पे थीं। मैं यहीं पे था। -----हो रही थी बारिश। बूंदें उतरीं इस ---पर। दे के सब- कुछ ,अब यहीं पे थीं। मैं ,मुझे पता नहीं, कहाँ पे था?

1 टिप्पणी:

  1. गणतंत्र दिवस की आप सभी को ढेर सारी शुभकामनाएं

    http://mohanbaghola.blogspot.com/2009/01/blog-post.html

    इस लिंक पर पढें गणतंत्र दिवस पर विशेष मेरे मन की बात नामक पोस्‍ट और मेरा उत्‍साहवर्धन करें

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aap svasth rahen.

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उज्जैन, मध्यप्रदेश, India
कुछ खास नहीं !