उठा लिया करवट को,जो मेरे साथ चिपकी रह गई थी। वो जो तुम्हें याद करते हुए ली थी। लम्बी होती करवट को टुकडों में लेने की आदत हो गई थी। जो बेचैनी भी कही जा सकती थी। बिस्तर पर चलते हुए सूरज तक जा पहुँचता था। मसली हुई आँखें मुझे छुट्टी लेने पर मजबूर कर देती थी। बिगडे हुए बच्चे की तरह बड़ा होता गया था मैं।
बहुत बढ़िया , आभार !
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