दिन बोलते हैं । बरस भी। सन ४७ --१९५०--६२--१९६४--७१---। १५---२६--३०। और भी सब बुदबुदाते हैं बोलते हैं। बोलते सब--हमसब । जिन्हें सुनना है वे हैं अपनों में हम नाच रहे है वे खुश हैं उत्सवों में उलटे पसरे हमारे भाग्य एकूप्रेषर वाली चप्पल हो गए हैं। संविधान कि फोटोकॉपी सुचना के अधिकार में प्राप्त कर ली है। उसे लागू करने में अब देर नहीं है। ऐसा हमारे वकील साब और साब कहते हैं।
"दिन बोलते हैं । बरस भी।"
जवाब देंहटाएंजय भाई आपके शब्द बस छू जाते हैं अन्दर कहीं ... !