सोमवार, 25 जनवरी 2010

नक़्शे से ऊपर उठता नन्हों का खुला हुआ हाथ

दिन बोलते हैं । बरस भी। सन ४७ --१९५०--६२--१९६४--७१---। १५---२६--३०। और भी सब बुदबुदाते हैं बोलते हैं। बोलते सब--हमसब । जिन्हें सुनना है वे हैं अपनों में हम नाच रहे है वे खुश हैं उत्सवों में उलटे पसरे हमारे भाग्य एकूप्रेषर वाली चप्पल हो गए हैं। संविधान कि फोटोकॉपी सुचना के अधिकार में प्राप्त कर ली है। उसे लागू करने में अब देर नहीं है। ऐसा हमारे वकील साब और साब कहते हैं।

1 टिप्पणी:

  1. "दिन बोलते हैं । बरस भी।"


    जय भाई आपके शब्द बस छू जाते हैं अन्दर कहीं ... !

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aap svasth rahen.

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