सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

कुत्ता

जितना भी सिमट कर बैठ सकता है

बैठा रहता है

किसी भी चीख या शोर पर

उसके कान खड़े नहीं होते

दुबली रोटियों ने उसे दुबला बना दिया है

वह चाहता तो

उठा सकता था आवाज

पर यह सोच कर

चुप रह जाता है

कि आदमी भी तो यही सब झेलता है

6 टिप्‍पणियां:

  1. .... कमाल-धमाल ... बेहद प्रसंशनीय रचना !!!

    जवाब देंहटाएं
  2. पर यह सोच कर
    चुप रह जाता है
    कि आदमी भी तो यही सब झेलता है
    ...आदमी पर ही तो व्यंग्य है!
    अच्छा लगा.

    जवाब देंहटाएं
  3. सरल शब्दों में कठिन अभिव्यक्ति ..आदमी भी तो यही सब झेलता

    जवाब देंहटाएं

aap svasth rahen.

मेरे बारे में

उज्जैन, मध्यप्रदेश, India
कुछ खास नहीं !