जितना भी सिमट कर बैठ सकता है
बैठा रहता है
किसी भी चीख या शोर पर
उसके कान खड़े नहीं होते
दुबली रोटियों ने उसे दुबला बना दिया है
वह चाहता तो
उठा सकता था आवाज
पर यह सोच कर
चुप रह जाता है
कि आदमी भी तो यही सब झेलता है
भला है वो आदमी न हुआ !
.... कमाल-धमाल ... बेहद प्रसंशनीय रचना !!!
पर यह सोच करचुप रह जाता हैकि आदमी भी तो यही सब झेलता है...आदमी पर ही तो व्यंग्य है!अच्छा लगा.
गहरा कटाक्ष.
सरल शब्दों में कठिन अभिव्यक्ति ..आदमी भी तो यही सब झेलता
क्या बात कही है साहब.. जवाब नहीं..
aap svasth rahen.
भला है वो आदमी न हुआ !
जवाब देंहटाएं.... कमाल-धमाल ... बेहद प्रसंशनीय रचना !!!
जवाब देंहटाएंपर यह सोच कर
जवाब देंहटाएंचुप रह जाता है
कि आदमी भी तो यही सब झेलता है
...आदमी पर ही तो व्यंग्य है!
अच्छा लगा.
गहरा कटाक्ष.
जवाब देंहटाएंसरल शब्दों में कठिन अभिव्यक्ति ..आदमी भी तो यही सब झेलता
जवाब देंहटाएंक्या बात कही है साहब.. जवाब नहीं..
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