सोमवार, 26 जनवरी 2009

गिर पड़ा होगा मुकद्दर उठाते समय सर

कमाल है कि फूट रहे है बोल उसके मुंह से। कमाल है कि उसे नींद आने लगी है । उसकी ऑंखें डूब गई हैं अथाह जल में। उसकी रातें लिपट गई हैं अंधेरे से। उसकी गली में जब होगी अपनी गुजर, वे भी छलकेंगे उभरे गालों पर ,आंसुओं की तरह। ---'फिक्र करते थे कि रुक जायें न कहीं वो रोके से ,बाँध लिए हमने हाथ झुकाकर सर। '

1 टिप्पणी:

  1. " उसकी ऑंखें डूब गई हैं अथाह जल में। उसकी रातें लिपट गई हैं अंधेरे से। "


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aap svasth rahen.

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